क्रोध् को कभी भी अपने उपर हावी न होने दें।

बोधप्रत कहानियाँ

एक धनिक का बोधिकुमार नामक एक पुत्र था। युवावस्था में कदम रखते ही उसके माता-पिता ने उसका विवाह एक अत्यन्त सुन्दरी युवती के साथ कर दिया। कुछ समय के पश्चात् बोधिकुमार के माता-पिता परलोक सिधार गए।

एक दिन उसने अपनी पत्नी से कहा, “प्रिय! मैं चाहता हूँ कि तुम धन का आनन्दपूर्वक उपभोग करो।” हैरान परेशान पत्नी ने पूछा, “और आप मेरे प्रभु?” “मुझे धन की आवश्यकता नहीं है। मैं मोक्ष की प्राप्ति के लिए हिमालय पर जाकर एक भिक्षुक के रूप में रहूँगा।” बोधिकुमार ने उत्तर दिया।

पत्नी ने पूछा, “भिक्षावृत्ति क्या केवल पुरुषों के लिए ही है?” बोधिकुमार ने कहा, “नहीं प्रिय! यह स्त्रियों के लिए भी है।” इसपर पत्नी बोली, “तब तो मैं भी भिक्षुणी बनकर आपके साथ चलूंगी। मुझे धन की कोई चाहत नहीं है।”

“जैसी तुम्हारी इच्छा, प्रिय…” बोधिकुमार ने कहा। इस प्रकार अपनी सारी संपत्ति का परित्याग कर दम्पत्ति वहाँ से दूर चले गए। एक छोटी सी कुटी बनाकर वहीं भिक्षुक का जीवन-यापण करने लगे। एक दिन दंपत्ति की मिठाई खाने की इच्छा हुई।

वे एक दुकान में गए। काशी का राजा भी अपने सेवकों के साथ उसी समय उद्दान में मनोरंजन हेतु आया हुआ था। राजा ने भिक्षुक दंपत्ति को वहाँ बैठे हुए देखा। वह भिक्षुणी के अप्रतिम सौंदर्य से मुग्ध् हो गया। पास जाकर राजा ने बोधिकुमार से पूछा, “नवयुवक, यह स्त्री तुम्हारी क्या लगती है?”

बोधिकुमार ने उत्तर दिया, “महाराज, इससे मेरा कोई संबंध् नहीं हैं हम दोनों भिक्षुक हैं। हाँ, जब हम गृहस्थ थे तब यह मेरी पत्नी थी।” राजा ने मन ही मन सोचा, “इसका अर्थ है कि यह उसकी कोई नहीं लगती है…” राजा ने बोधिकुमार से कहा, “यदि कोई बलपूर्वक तुम्हारी इस सुंदर पत्नी को तुमसे दूर ले जाएगा तो तुम क्या करोगे?”

बोधिकुमार ने उत्तर दिया, “यदि कोई बलपूर्वक मेरी पत्नी को दूर ले जाएगा और इस कारण मैं अपने भीतर क्रोध् की उठती ज्वाला को महसूस करूँगा तो मैं उसे ठीक उसी तरह दबा दूँगा जैसे तेज बारिश धूल-कण को दबा देती है।”

राजा ने बोधिकुमार की बातों पर कोई ध्यान नहीं दिया। भिक्षुणी की सुंदरता से मुग्ध् राजा ने अपने सेवकों को आज्ञा दी, “इस भिक्षुणी को मेरे महल में ले जाओ।”

राजा की आज्ञा का पालन हुआ। रोती हुई भिक्षुणी को राजसेवक खींचता हुआ महल ले गया। भिक्षुणी ने राजा के व्यवहार की बहुत भर्त्सना की। राजा ने भरसक प्रयास किया कि वह भिक्षुणी का मन बदल सके पर सफल न हो सका। क्रुद्ध राजा ने भिक्षुणी को बंदीगृह में डाल दिया और फिर सोचने लगा, “यह भिक्षुणी मुझसे विवाह करने के लिए तैयार नहीं हैं, और इसे बलपूर्वक लाने पर भी भिक्षुक ने क्रोध् नहीं जताया। मुझे स्वयं ही उद्दान में जाकर देखना चाहिए कि भिक्षुक कर क्या रहा है?”

राजा चुपचाप उद्दान में पहुँचा। वहाँ बोधिकुमार शांतिपूर्वक बैठकर अपना वस्त्र सिल रहा था। राजा घोड़े से उतरकर उसके पास गया।

बोधिकुमार ने राजा की ओर कोई ध्यान नहीं दिया और अपने काम में तल्लीन रहा। राजा ने सोचा कि भिक्षुक क्रोधवश उससे बात नहीं कर रहा है।

बोधिकुमार ने राजा के मनोभावों को समझकर राजा से कहा, “मुझे क्रोध् आया था पर उसे मैंने स्वयं पर हावी नहीं होने दिया। अपने जीवनकाल में मैं कभी भी क्रोध् को स्वयं पर हावी नहीं होने दूंगा। जैसे बारिश धूल को दबा देती है उसी प्रकार मैंने क्रोध् को दबा दिया है।”

क्रोध् के कुप्रभाव के विषय में कई बातें बोधिकुमार ने बताईं। राजा सब कुछ शांतिपूर्वक सुनता रहा। उसका मनोविकार दूर हो गया और उसे अपनी गलती का भान हो गया।

भिक्षुक की शिक्षा से अभिभूत राजा ने भिक्षुणी को उद्दान में लाने का आदेश दिया। भिक्षुक दंपत्ति के समक्ष अपने घुटनों पर बैठकर हाथ जोड़कर उसने क्षमा याचना करी और कहा, “हे श्रद्धेयसन्यासी! आप दोनों इस उद्दान में प्रसन्नतापूर्वक रहते हुए भिक्षावृत्ति का पालन करें। मैं आप लोगों की रक्षा करूँगा।”

ऐसा कहकर भिक्षुक दंपत्ति को नमन कर राजा अपने महल चला गया। भिक्षुक दंपत्ति आराम से वहाँ रहने लगे।

कहानी से मिली सिख: क्रोध् को कभी भी अपने उपर हावी न होने दें।

प्रेमचंदजी की कहानियोमे से साभार

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