बेबस पिता

पिता पहन रहे थे कपड़े, बेटा बहुत व्याकुल था,

साथ में मेला जाने हेतु, सच में वो आकुल था।
सपनों के सागर आखों में, भाव बहुत उतरें थें,
लाल पिला और सतरंगी, सब खिलौने अपने थें।।

सोच सोच कर बालक, दरवाज़े पर आता था,
पापा जल्दी पहनो कपड़ें बार बार चिल्लाता था।

किन्तु पिता की हाय! बेबसी,समझ नही पाता था,

आँगन में कूद कूद कर, इठलाता, मुस्काता।।

लेकिन कपड़े भी क्या आज, भावज्ञ हो गयें थें?

जो तन पर धारण करने वक़्त, इतने उलझ रहें थें।

या बेबस लाचार पिता के भावों को ढ़कने में वो,

आज स्वयं को असमर्थ, निरीह समझ रहें थे।।

पिता जब बच्चों की, इक्षापूर्ति नही करपाता होगा।

तब उसका हृदय क्या लहूलुहान नही होता होगा?

बोलों इससे बड़ी क्या, कोई दुखद कहानी होगी?

जीकर भी उस जीवन में क्या कोई रवानी होगी।।

सच में आज बिधाता भी बहुत शर्मिंदा होगा,
इसके भाग्य को देख कर स्वयं को कोसता होगा।

क्यों न इसके हिस्से में, और कुछ धन लिखपाया,

धरा पर ग़रीबी पीड़ा को ,मैं क्यों न मिटा पाया।।

धनाभाव में सब कर्तव्य ,भाव भी,टूट टूट गिरतेंहैं,

मनोमङ्ग और आँखोंके सपने सब बिखर पड़तें हैं।

बेबसी, लाचारी पीड़ाको वही पिता समझपाता है,

जो अपने बच्चों का सुसपना नही खरीद पताहै।।

 

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