जद्दोजहद

the great indian kitchen

इस मन के खेल को समझना भी बहुत मुश्किल होता है हमेशा ही। ये अपने आगे “बे”लगा कर हर काम करने को आतुर मनःस्थिति को कब बिपरीत दिशा में मोड़ दे कहा नहीं जा सकता है।

इधर कलम ऐसे दीवानी हो जाती कागज़ के सीने पर दौड़ लगाने को जैसे बरसों से भूखी -प्यासी व्याकुल बैठी हो। दिल कहता बस बिछा दी जाय मोटे-मोटे् शब्दों के जाल को कोरे पन्नों पर ।

ठीक उसी क्षण निस्पृह आँखें देखने लगतीं सिंक में पड़े बेशुमार बरतनों के अंबार, कुछ- एक कटी सब्जियां, मुड़े- सिकुड़े से बिस्तर और दरबाजे के कोने में सूखे कपड़ों से लदी एक कुर्सी मुँह चढ़ाती-सी।

कितनी असहाय होती है ना खुद की मनःस्थिति तत्काल की!!

ये मन दो दिशाओं में दौड़ने लगता है, खुद की लड़ाई शुरू हो जाती खुद से ही अनायास ।

अंदर से आवाज़ आई छोड़ दो ये रोजमर्रा की किच-पिच,खटर पटर ।ये तमाम झमेले तो चलने हीं हैं ताउम्र।

उठो उस बेताब दीवानी कलम को कागज के टुकड़े से मिला दो। वो सारे शब्द जो अंतर्मन में तरंगित हो रहे,उन्हे एक लय में पिरो लो और खाली करो अंतस् को।

हाँ…

ये सही है, आज अपने मन का कर ही लेती हूँ।

दुनियादारी, चौका- चूल्हा सब यथावत छोड़ कागज़ पर कलम दौड़ाने शान्त मन से बैठ गई मैं।

अरे!!! ये क्या??

तत्क्षण ही मन ने अपने आगे बे”लगा लिया ।

अभी बर्तन मांजते हुए जो हाथ कलम के लिए मचल रहे थे, उनमें तो कंपन भी नहीं…

कलम पकड़ने की ताक़तभी शेष नहीं बची हो जैसे।

तब तो ‘क्या पकेगा आज’,  इस पर जितनी बार दिमाग लगाती थी तो घुसपैठ उन शब्दों की हो रही थी, जो कागज पर बिखड़ना चाहते थे, अब कैसे बिलकुल खाली शब्द विहीन, सुन्न पड़ गया ये दिमाग।

कलम…?, कलछी ..?, ना सिंक के बरतन, अरे नहीं…. मेरी कविताएँ, ना -ना….

बिखरे घर को समेटूं फिलहाल…..

ओह्हो ……

ये क्या, जद्दो-जहद में अचानक नज़रे उठीं आंखों ने दीवार पर टंगी घड़ी को देख लिया।

बस्सस…. कलम, कागज़, कविता सबका नशा काफ़ूर हो गया तुरंत ही।

वाह जी वाह… क्या लिखा है आपने आज, ये सुनने की लालसा लिए कानों में अब एक ही आवाज़ गूँज रही!

पता नहीं सुबह से क्या करती रहती हो तुम, कभी तो समय पर घर को संभाल लिया करो ढंग से।

उफ्फ़… मैं भी ना, काॅपी -कलम के किस झमेले में लग जाती हूँ सुबह ही।

भागी आइ रसोई में। बाबा रे.. यहाँ तो कटी सारी सब्जियां, खाली कड़ाही-कुकर मुँह लटका के बैठे हैं, सिंक के बरतन सूख के अनसन पर हैं, बिखरे घर मुँह चिढ़ा रहें और मेरी कलम?????

उफ्फ़ …मेरी कलम भी रूठ गई मेरे से फ़िलहाल…..

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