आपकी कौन-सी बुरी आदतें आपके अपनों को बेगाना बनाती हैं?

आपकी कौन-सी बुरी आदतें आपके अपनों को बेगाना बनाती हैं

आपकी कौन-सी बुरी आदतें आपके अपनों को बेगाना बनाती हैं? जानिए और छोड़ने का प्रयास कीजिए

अधिकांश लोगों को आप यह शिकायत करते देखते हैं कि,

“इस आजकल के दौर में कोई किसी का नहीं सब मतलब के हैं।”

साधारण अवस्था में तो अपने सगे-संबंधी और यार-दोस्त सब साथ खड़े दिखाई देते हैं मगर जब विपरीत परिस्थितियां आती हैं तो सब मुंह मोड़ लेते हैं और कोई भी साथ खड़ा नज़र नहीं आता।

अपने भी बेगाने बनकर पेश आते हैं।”

अधिकांश मामलों में यह कटु सत्य बनता भी जा रहा है क्योंकि आजकल ज्यादातर लोग खुद में ही सिमटते जा रहे हैं, और उन्हें अपने निज परिवार के हित के सामने किसी अन्य का हित नज़र नहीं आता है।

किसी अन्य का अहित भी उनके कारण हो तो हो बस उनका हित होना चाहिए।

यहां तक कि पहले जहां सगे भाई-बहनों के बीच ताउम्र गहरा प्रेम और अपनापन हुआ करता था आजकल उनके बीच भी अपनेपन की कमी एवं आपसी दूरियां सामान्य बात हो गई हैं।

यही हाल यार- दोस्तों, पास-पड़ोसियों और अन्य सामाजिक रिश्तों का भी है।

कहीं भी पहले जैसा आपसी प्यार-प्रेम और भाईचारा देखने को नहीं मिलता।

आखिर लोगों के बीच बढ़ती इस प्रकार की दूरियों और बेगानेपन या पराएपन के क्या कारण हो सकते हैं?

क्या समय के साथ और भी बिगड़ती जा रही इस तरह की पारिवारिक व सामाजिक परिस्थितियों को नियंत्रित किया जा सकता है?

बिलकुल किया जा सकता है।

अगर हम नीचे दी गई अपनी इन पांच बुरी आदतों को छोड़ दें तो स्थिति में बदलाव आ सकता है।

१) मानसिक विकृतियां अपनों को बेगाना बनाती हैं।

कुछ लोगों में कई प्रकार की मानसिक विकृतियां या कुंठाएं घर कर जाती हैं और उन कुंठाओं के कारण सब प्रकार के रिश्तों में खटास पैदा होता है और आपसी रिश्ते बिगड़ जाते हैं।

पारिवारिक और सामाजिक सब रिश्तों में दूरियां पनप जाती हैं।

इन मानसिक विकृतियों अथवा कुंठाओं में मुख्यतः भय, क्रोध, हीनता, ईर्ष्या, चिड़चिड़ापन आदि सम्मिलित हैं।

इन मनोविकारों में से अगर कोई भी हमारे स्वभाव का हिस्सा बन जाता है, या हमारी आदत में शुमार हो जाता है, तो उसके कारण हमारे आचार-व्यवहार में खामी उत्पन्न हो जाती है।

यही मानसिक खामी हमें दूसरों के साथ सामान्य रूप से पेश नहीं आने देती और हम अपने व्यवहार से दूसरों को नाराज करते रहते हैं।

हमारे कारण दूसरों के मन को बार-बार ठेस पहुंचती है, तो वे हमसे दूरियां बना लेते हैं और कई बार तो रिश्ता ही तोड़ लेते हैं।

इसीलिए अगर आपमें कोई ऐसी कुभावना या बुरी आदत है तो उसे तुरंत छोड़िए और दूसरों पर उसका बुरा असर कभी मत पड़ने दीजिए।

२) स्वार्थ अथवा लालच से अक्सर रिश्ते टूटते हैं?

स्वार्थ या लालच का भाव कम या अधिक मात्रा में हर इनसान में पाया जाता है।

इसकी जायज मात्रा से तो किसी पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता मगर जब स्वार्थ या लालच की हद हो जाती है तो यह खून के रिश्तों में भी दुश्मनी के बीज बो देते हैं और उनके बीच दूरियों का पहाड़ खड़ा कर देते हैं।

इसीलिये अपनी इस बुरी आदत को ठीक करने का प्रयास कीजिए।

लालच या स्वार्थ को मन में जगह दीजिए मगर इतनी कभी नहीं कि ये आप पर बेईमानी की मुहर लगा दें।

अपने भीतर की उदारता को हमेशा जिंदा रखने की कोशिश कीजिए और अपने हक में जीना सीखिए।

त्याग को महत्व दीजिए एवं ग्रहण की उपेक्षा करने की आदत डालिए।

लालच या स्वार्थ के कारण अपनों का दिल कभी मत दुखाइए।

३) धन, पद और योग्यता का घमंड अपनों को पराया बनाता है।

अक्सर देखने में आता है कि कुछ लोग अपने धन, पद व योग्यता के घमंड में अंधे होकर अपनों को पराया बनाने पर तुल जाते हैं।

ऐसे लोगों की खास बात यह होती है कि ये अपने उन सगे-संबंधियों व यार-दोस्तों से मुंह मोड़ लेते हैं जिनकी सामाजिक प्रतिष्ठा को ये अपनी बराबरी की नहीं मानते अर्थात् जिन्हें ये अपने से गरीब समझते हैं।

उंचे स्टेट्स में बैठने के आदी ये घमंड के मारे अपनी इसी मानसिक कमजोरी के कारण अच्छे-खासे रिश्तों का सत्यानाश कर बैठते हैं।

इस तरह का घमंड, सबसे बुरी आदत है जो अपने सच्चे सगे-संबंधियों या यार-दोस्तों आदि
को अपने से दूर करने में सबसे ज्यादा भूमिका निभाती है।

इसलिए इसे हमेशा के लिए त्याग दीजिए।

और बिना किसी सामाजिक स्टेट्स का विचार किए सबसे पूरे उत्साह और प्रेम से मिलना सीखिए।

अगर ऐसा करेंगे तो आपके चाहने वाले सदा आपके साथ बने रहेंगे।

४) दूसरों के मान-सम्मान या आवभगत में कमी भी बढ़ाती पारस्परिक दूरियां।

हम में से सबकी यह सोच तो होती है कि हम जिससे मिलें या जिसके घर जाएं वह हमारा पूरा मान-सम्मान करे और हमारी तह दिल से आवभगत करे।

मगर जब अपनी बारी आती है तो बहुत से लोग अपनी इस नैतिक जिम्मेदारी को भूल जाते हैं कि जैसा मान-सम्मान या आवभगत वह अपने लिए चाहते हैं उन्हें वैसा ही मान-सम्मान दूसरों का भी करना चाहिए और उनकी आवभगत भी पूरे मन से करनी चाहिए।

अगर आप ऐसा नहीं करते तो कभी-कभी आपके रिश्तेदार या यार-दोस्त आपसे नाराज होकर दूरियां बना लेते हैं।

सच मानिए अपनी इस बुरी आदत को त्याग कर आप सबके प्यारे इनसान बन सकते हैं क्योंकि दुनिया में लोग सबसे ज्यादा उसी आदमी को पसंद करते हैं जो हमेशा उनका आदर-सम्मान और आवभगत करने के लिए तैयार रहता है।

ऐसे व्यक्ति की मदद को भी हर कोई तैयार रहता है।

५) सामाजिक जिम्मेदारियों से दूर भागने की आदत खुद ही लोगों से दूर ले आती है।

कुछ लोग अपने में या अपने खुद के परिवार में ही उलझे रहते हैं।

उनमें सामाजिक जिम्मेदारियों के प्रति कोई रुचि नहीं होती है और न ही वे सामाजिक मेलजोल बढ़ाने में दिलचस्पी लेते हैं।

ऐसे लोग न तो सामाजिक उत्सवों या गतिविधियों में शामिल होते हैं, और न ही घर से निकल कर लोगों के साथ बैठते-उठते हैं।

इसी कारण आसपास के लोग उनसे दूरियां बना लेते हैं और उनका सामाजिक जीवन समाप्त सा होकर रह जाता है।

इसीलिए अपनी इस बुरी आदत को छोड़कर आज से ही सामाजिक आदमी बनने की कोशिश शुरू कर दीजिये।

आसपास के लोगों से मिलकर रहना आरंभ कीजिए तथा उनके सुख-दुख में शामिल होकर अपनी तरफ से जो मदद बन सके करने को सदैव तैयार रहिए।

सामाजिक गतिविधियों में बढ़-चढ़कर भाग लीजिए और सबके साथ प्रेम और उदारता का भाव दर्शाइए।

अगर आप ऐसा करेंगे तो जीवन की फीकी तस्वीर स्वतः ही खुशी के रंगों से रंग जाएगी।

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