शरारती लोमड़ी को सबक

शरारती लोमड़ी को सबक बोध कथाएँ

किसी जंगल में एक लोमड़ी रहती थी। उसका नाम था, ‘निम्मो’….

निम्मो बहुत ही शरारती थी। वह अपनी शरारतों से जंगल के सब जानवरों को परेशान करती रहती थी।

जंगल के बड़े -बूढ़े जानवर उसे समझाते भी थे कि शरारत मत किया करो।

तुम्हारी शरारतों से जानवर परेशानी में पड़ जाते हैं और उनका नुकसान भी हो जाता है।

मगर निम्मो पर उनके समझाने का कोई असर नहीं होता था, क्योंकि उसे तो शरारत करने और दूसरों दुःख देने में बड़ा मज़ा आता था।

एक दिन निम्मो ने मोटी बंदरिया के बच्चे बंटू से कहा कि,

“उधर बरगद के पास झाड़ियों में मधुमक्खियों ने अपने छत्ते में बहुत सारा शहद इकट्ठा करके रखा है।

तुझे शहद खाना हो तो जाकर खा ले।”

बंटू ने उसकी बात न मानते हुए कहा कि,

“अगर उसने छत्ते में हाथ डाला तो मधुमक्खियां उसे काटेंगी और उसे बहुत पीड़ा होगी।”

मगर निम्मो ने उसे समझाया कि,

“मधुमक्खियां इस समय उसे काट नहीं सकती क्योंकि वे सब तो सो रही हैं, और जब तक वे सोकर नहीं उठतीं किसी को नहीं काटतीं।

बस तू धीमे से हाथ डालना।”

बंटू नासमझ था।

वह उसकी बात मान कर मधुमक्खियों के छत्ते में जा घुसा।

जैसे ही उसने छत्ते में हाथ डाला मधुमक्खियों ने डंक मार-मारकर बंटू के मुंह को सूजा दिया।

उसका मुंह पिलपिले खरबूजे जैसा हो गया।

उसकी यह हालत देखकर निम्मो खूब हंसी, मगर बंटू की मां मोटी बंदरिया को बहुत दुःख हुआ।

उसे निम्मो पर बहुत गुस्सा आया और उसने निम्मो को खूब बुरा-भला सुनाया।

उस दिन जंगल के बूढ़े हाथी ने भी निम्मो को समझाया था कि,

“अभी भी समय है, तू शरारतें करना छोड़ दे। तेरी शरारतें दूसरों के दुःख का कारण बनती हैं और वे सब तुझसे नाराज होते हैं।

ध्यान रख किसी दिन तू किसी मुसीबत में पड़ गई तो तेरी सहायता के लिए कोई भी आगे नहीं आएगा।

उस दिन तेरा सारा घमंड निकल जाएगा।”

मगर निम्मो ने उसकी बात को कानों पर से टाल दिया।

कुछ दिन ऐसे ही बीत गए। एक रोज़ निम्मो लोमड़ी पहाड़ी की तलहटी वाली दलदली झील के किनारे पर घूम रही थी तो उसकी नज़र एक भैंसे पर पड़ी।

भैंसा झील के किनारे उगी, हरी-भरी घास को चरने का आनंद ले रहा था।

निम्मो को भैंसे के साथ मजाक करने की सूझी।

वह भैंसे के पास गई और बोली,

“अरे काले-कलूटे भैंसे, तू इस झील में क्यों नहीं नहा लेता! तू इस झील में नहा कर तो देख, तेरा रंग निखर आएगा।

तू भी मेरी तरह गोरा-चिट्टा हो जाएगा।”

कह कर लोमड़ी मुस्कराते हुए उसकी ओर देखने लगी।

लोमड़ी की इस हरकत से भैंसे को बहुत गुस्सा आया।

उसने आव देखा न ताव लोमड़ी को अपने बड़े -बडे सींगों पर उठाया और दलदल में फेंक दिया और फिर बोला,

“ले तू नहा इस दलदल में और अपना रंग-रूप और भी निखार ले। कहकर भैंसा फिर घास चरने लगा।”

उधर लोमड़ी दलदल में फंस गई तो उसकी जान पर बन आई।

वह “बचाओ-बचाओ ” चिल्लाने लगी ।

मोटी बंदरिया ने उसकी चीख सुनी तो दलदल के किनारे आकर कहने लगी,

“शरारती लोमड़ी, आज तुझे कोई नहीं बचाएगा। आज इस जंगल को तेरी शरारतों से छुटकारा मिल जाएगा। चल जल्दी से समा जा इस दलदल में।”

लोमड़ी घबरा कर उसकी खुशामद करते हुए कहने लगी – मुझे बचा लो।

आज मेरी जान बच जाएगी तो मैं जीवन में भूलकर भी ऐसी शरारतें नहीं करूंगी जिनसे किसी को परेशानी या किसी प्रकार की हानि हो।

मगर मोटी बंदरिया उसकी मदद के लिए बिलकुल भी तैयार न हुई।

उसने लोमड़ी को साफ़-साफ़ कह दिया कि वह उसकी सहायता नहीं करेगी, बल्कि उसे मरते हुए देखकर खुश होगी।

लेकिन तभी वहां जंगल का बूढ़ा हाथी आ गया और उसने दलदल में फंसी लोमड़ी की जान बचा ली।

मोटी बंदरिया ने उसे मना तो बहुत किया पर वह नहीं माना।

उस दिन निम्मो ने कभी भी शरारत न करने का संकल्प लिया और फिर उस संकल्प को जीवन भर निभाया।

शिक्षा : हमें ऐसी शरारतें कभी नहीं करनी चाहिए जो दूसरों के दुःख का कारण बनें।

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