क्या आपने देखी है, सुनील ग्रोव्हर कि वेबसीरिज ‘सनफ्लाॅवर’

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Zee-5 पर रिलीज हुई विकास बहल (वही विकास बहल जिन्होंने ‘क्वीन’ तथा ‘सुपर30’ फिल्में लिखीं थीं) द्वारा रचित वेबसीरिज ‘सनफ्लाॅवर’ अनुभवी और बेहतरीन कलाकारों का साथ मिलने के बावजूद दर्शकों पर कुछ खास रंग नहीं जमा पाई।

यह सीरिज एक मर्डर पर बेस्ड है और इसमें कातिल को ढूंढने की प्रक्रिया को दिखाया गया है। मगर सबसे ज्यादा खलने वाली बात यह है कि कहानी का ऐसा विषय होने के बावजूद कहीं कुछ खास सस्पेंस, थ्रिल नजर नहीं आता है और काॅमेडी की पकड़ भी निरंतर मजबूत नहीं दिखाई देती है।

काॅमेडी काफी ढीली और बिखरी हुई है। कहानी में कातिल की खोज की प्रक्रिया को दिखाया जाता है मगर कहानी एक ऐसे मोड़ पर खत्म कर दी जाती है जहां तमाम सवालों के जवाब मूक बनकर रह जाते हैं।

आठ एपिसोड की इस वेबसीरिज के प्रत्येक कलाकार ने अपने किरदार को बड़े ही सलीखे से निभाया है।

उदाहरणतः प्रोफेसर आहूजा के किरदार में मुकुल चड्ढा अपनी शानदार छाप छोड़ते हैं। उनकी डबल पीएचडी तथा हिंदी भाषा के प्रति गहरे लगाव के बीच उनका गुस्सैल और कामुक हसबैंड का किरदार सबकी वाह-वाही लूटता है। इसके अलावा राधा भट्ट ने भी अपने किरदार को पूरी तन्मयता से निभाया है। वह एक असहाय गृहिणी की भूमिका में सब पर अपनी छाप छोड़ती हैं।

सभी कलाकारों ने अपनी-अपनी जगह बेहतरीन अदाकारी का परिचय दिया मगर कमजोर कहानी, बिखरे किरदारों और सशक्त व कल्पनाशीलता निर्देशन के अभाव ने इस वेबसीरिज की रंगत को फीका कर दिया।

सुनील ग्रोवर, आशीष विद्यार्थी, रणवीर शौरी जैसे मंजे हुए कलाकार कमजोर कहानी और निर्देशन के कारण कुछ खास रंग नहीं जमा पाए।

इस सीरिज में अगर सुनील ग्रोवर की बात करें तो उनका अभिनय नि:संदेह सराहनीय है और उनके अभिनय को देखते हुए कहा जा सकता है कि उन्होंने इस वेबसीरिज को इसके अंत तक बचाए रखने की भरसक कोशिश की है।

वह कुछ हद तक इस सीरिज के दर्शकों को बांधकर रख पाने में सफल रहे हैं। हालांकि ‘सनफ्लाॅवर’ की कहानी मनोरंजक और व्यवस्थित नहीं है और इसका निर्देशन भी काफी असशक्त तथा अप्रभावशाली है, तथापि सुनील ग्रोवर ‘सनफ्लावर’ को अंत तक मुरझाने नहीं देते हैं।

उनका अभिनय बेशक से प्रशंसा के काबिल है, मगर उनके अभिनय से लोग जिस उम्मीद की आशा करते हैं उस उम्मीद की बात करें तो कुछ हद तक वह भी खरे नहीं उतर पाए हैं।

इस सीरिज में उन्होंने सोनू सिंह का रोल किया जो अपने आप में विविध रंग समेटे हुए है मगर फिर भी उन्होंने इसे बड़ी आसानी से निभाया है। इस कारण उनकी तारीफ करना तो बनता ही है।

इस सीरिज के कलाकारों की इतनी सशक्त भूमिका होने के बावजूद दर्शकों द्वारा इस सीरिज को खास पसंद न करने का कारण इसकी कहानी और निर्देशन की खामियां ही बनी हैं।

इसकी कमजोर कहानी में पात्रों का इस तरह से बिखराव किया गया है कि उनके बीच कोई संबंध ही स्थापित नहीं हो पाया। उन्हें देखकर बस यही लगता है कि सब अपने अलग-अलग किरदार पर ही ध्यान दे रहे हैं और उनके बीच कोई तालमेल ही नहीं है। इस वेबसीरिज की प्रासंगिक घटनाओं या कहानियों के बीच मुख्य कहानी कहीं खो- सी गयी है और निर्देशन के दौरान मुख्य कहानी पर बहुत कम ध्यान दिया गया है।

इसी वजह से अंत में देखने वालों को यही लगता रहता है कि मुख्य कहानी तो छूट ही गयी है। इस आधार पर यही कहा जा सकता है कि लेखक ने कहानी छोड़ बस किरदारों को ही रचा है। कहानी दर्शकों में रोमांच पैदा नहीं कर पाती है और सवालों के जवाब दिए बिना ही कहानी खत्म हो जाती है।

अंततः इस वेबसीरिज ‘सनफ्लावर’ के बारे में यही कहा जा सकता है कि इसमें बार-बार देखने की ललक जगाने वाली तो कोई खास विशेषता नजर नहीं आती है मगर सुनील ग्रोवर की काॅमेडी के दीवाने उसके फैन इस सीरिज को अवश्य देखें, क्योंकि इसमें भी उनकी अदाकारी का एक अलग ही अंदाज़ देखने को मिलेगा

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